Wednesday, 8 August 2012

गए दिनों का सुराग लेकर किधर से आया,किधर गया वो

अजीब मानुष अजनबी था,मुझे तो हैरां कर गया वो

न अब वो यादो का चढ़ता दरिया,न फुर्सतों की उदास बरखा

यू ही जरा सी कसक दिल में,जो जख्म गहरा था भर गया वो

बस एक मंजिल है बुलहविस की,हज़ार रस्ते अहले-दिल के

यही तो फर्क मुझमे-उसमे,गुजर गया मैं ठहर गया वो

शिकस्ता-पा राह में खड़ा हूँ,गए दिनों को बुला रहा हूँ

जो काफिला मेरा हमसफ़र था,मिसाले-गर्द-सफर गया वो

कुछ अब सँभलने लगी है जां भी,बदल चला दौरे आसमां भी

जो रात भारी थी टल गयी है जो दिन कड़ा था गुजर गया वो

वो जिनके शान पे हाथ रख कर सफर किया तूने मंजिलों का

तेरी गली तक तो हमने देखा फिर न जाने किधर गया वो.

                                                                                                                   (नासिर काजमी)  

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