Friday, 10 August 2012

दिले बेताब पर अब किस तरह काबू आए
जिस तरफ देखता हूँ मुझको नज़र तू आए
जुल्फ बिखरा के जो गुलशन में कभी तू आए
फूल तो फूल हैं कांटो से भी खुशबू आए
खुश्क शाखों पे भी मुश्किल है के आ जाये बहार
मेरे अहसास की वादी में अगर तू आए
वक्त ने फ़ेंक दिया लाके हवेली से कहां
एक दोशीजा के पैरों में जो घुंगरू आए
हो गयी दूर जवानों से हमारे तहजीब
अब तो शायद ही पलट कर कभी उर्दू आए
उनसे बिछड़े हुए मुद्दत हुई फिर भी ‘हसरत’
जाने क्यों आज मेरी आँखों में आंसू आए.
                                (हसरत खतौलवी)

No comments:

Post a Comment