Thursday, 30 August 2012


यूँ लगता है सबकुछ खोने आया था

मैं इस घर में तुझको रोने आया था

तू मेरे हमराह तो आया था लेकिन

तन्हाई के काँटे बोने आया था

मैं उसके दीदार से कब सैराब हुआ

वो तो बस दमन को भिगोने आया था

मैं तकता था उसको प्यासे ओठों से

बादल मेरी नाव डुबोने आया था

गहरी नींद से मुझको जगाकर छोड़ गया

ख्वाब मेरी आँखों में सोने आया था.

                              (मुगन्नी तबस्सुम)

फूल यादों के खिला देती है

रात दीवाना बना देती है

नींद आँखों को सजा देती है

ख्वाब में दिल को जगा देती है

चाँद आँखों में भटकता है अभी

अब भी जंजीर सदा देती है

एक हँसतीं हुई तस्वीर को मैं

देखता हूँ तो रुला देती है

जिंदगी और तो क्या देती है

गम की मियाद बढ़ा देती है.

                      (मुगन्नी तबस्सुम)

सुब्ह होती है छुपा लो हमको

रात भर चाहने वाले हमको

हम हकीकत है नजर आते है

दास्तानों में छुपा लो हमको

दिल न पा जाये कहीं शब का राज

सुब्ह से पहले उठा लो हमको

हम ज़माने के सताए है बहुत

अपने सीने से लगा लो हमको

वक्त के होंट हमें छु लेंगे

अन कहे बोल है हम गा लो हमको

कल खरीदारों के पहरे होंगे

आज की रात चुरा लो हमको.

                        (बशीर बद्र)

 

Tuesday, 28 August 2012


याद आता है जमाना कैसा

रूठना कैसा मनाना कैसा

नारसायी थी मेरी किस्मत की

मिल गया तुझको बहाना कैसा

शहर की संग जनी से बचकर

दश्त में ख़ाक उड़ाना कैसा

दोनों हाथों से लुटाया हमने

जिंदगी भी थी खजाना कैसा.

                       (मुगन्नी तबस्सुम)

दिल में कोई बात है अब कह जाने दे

आसूँ आँख में आये है बह जाने दे

अपने हाल पे छोड़, दिलासा रहने दे

गम ही अच्छा लगता है सह जाने दे

मेरी सोचों पर यों पहरे तो न बिठा

एक खलिश सी दिल में है रह जाने दे

मंजर कुछ तो बदलेगा वीरानी से

एक खस्ता तामीर को अब ढह जाने दे

पिछली शब को उठकर क्यों तू रोता है

बात नहीं कहने की तो मत कह जाने दे.

                                (मुगन्नी तबस्सुम)

Monday, 27 August 2012


खुश रहे या बहुत उदास रहे

जिंदगी तेरे आस-पास रहे

वो नहीं है तो उसकी आस रहे

एक जाये तो एक पास रहे

जब भी कसने लगा उतार दिया

इस बदन पर कई लिबास रहे

घुल गए अपनी बदनसीबी में

वो सितारे जो अपने पास रहे

आज हम सब के साथ खूब हँसे

और फिर देर तक उदास रहे

दोनों एक दूसरे का मुहँ देखे

आईना आईने के पास रहे.

                      (बशीर बद्र)

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा

किश्ती के मुसाफिर ने कभी समन्दर नहीं देखा

बेवक्त अगर जाऊंगा सब चौंक पड़ेंगे

इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा

जिस दिन से चला हूँ मिरी मंजिल पे नजर है

आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले है

तुमने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा

पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला

मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा.

                              (बशीर बद्र)

Friday, 24 August 2012


चढ़े हुए थे जो दरिया उतर गए अब तो

मुहब्बतो के ज़माने गुजर गए अब तो

न आहाते है,न दस्तक,न चाप कदमो की

नवाहे जाँ से सदा के हुनर गए अब तो

सबा के साथ गयी बुए पैरहन उसकी

जमीं की गोद में गेसू बिखर गए अब तो

मसाफते है बहुत दश्ते नारसाई की

तमाम रास्ते दिल में ठहर गए अब तो

बसा ले जाके कहीं तू भी गोशए हिरमा

जो तेरे चाहने वाले थे मर गए अब तो.

                               (मुगन्नी तबस्सुम)

Thursday, 23 August 2012


वो बेवफा है हमेशा ही दिल दुखाता है

मगर हमें तो वही एक शख्स भाता है

न खुशगुमान हो उस पर तू ऐ दिलो-सादा

सभी को देख कर वो शोख मुस्कुराता है

तेरे करम की यही यादगार बाकी है

ये एक दाग जो इस दिल में जगमगाता है

अजीब चीज है ये वक्त जिसको कहते है

कि आने पाता नहीं और बीत जाता है.

                              (शहरयार)

Wednesday, 22 August 2012


दामे-उल्फत से छूटती ही नहीं

जिंदगी तुझको भूलती ही नहीं

कितने तूफॉ उठाये आँखों ने

नाव यादों की डूबती ही नहीं

तुझसे मिलने की तुझको पाने की

कोई तदबीर सूझती ही नहीं

एक मंजिल पर रुक गई है हयात

ये जमीं जैसे घुमती ही नहीं

लोग सर फोड कर भी देख चुके

गम की दीवार टूटती ही नहीं.

                         (शहरयार)

Tuesday, 21 August 2012

सितम ही करना जफा ही करना निगाहे-उल्फत कभी न करना
तुम्हे कसम है हमारे सर की हमारे हक में कमी न करना
कहाँ का आना कहाँ का जाना वो जानते ही नहीं ये रस्मे
वहाँ है वादे की भी ये सूरत,कभी तो करना कभी न करना
हमारी मय्यत पर तुम जो आना तो चार आसूँ बहा के जाना
जरा रहे पासे-आबरू भी,कहीं हमारी हँसी न करना
वो इक हमारा तरीके-उल्फत कि दुश्मनों से भी मिल के चलना
ये एक शेवा तेरा सितमगर कि दोस्त से दोस्ती न करना
बुरी है ए दाग राहे-उल्फत खुदा न ले जाये ऐसे रस्ते
जो अपनी तुम खैर चाहते हो तो भूल कर दिल लगी न करना.
                                                  (दाग देहलवी)
जिस शख्स को गम अपने छुपाने नहीं आते
उसके लिए खुशियों के ज़माने नहीं आते
कतरा के न चलिए कभी पथरीली डगर से
आसान सी राहों में खजाने नहीं आते
मुश्किल में फकत गैर ही दुश्मन नहीं बनते
अपने भी तो अपनों को बचाने नहीं आते
आ जाये अगर वक्त तो है जान भी हाजिर
हम उनमें से है जिनको बहाने नहीं आते
मैं इसलिए हर शख्स की नजरों में बुरा हूँ
बस मुझको मेरे ऐब छुपाने नहीं आते.
                              (हस्तीमल ‘हस्ती’)

Monday, 20 August 2012

तुम्हारे खत में नया इक नाम किस का था
न था रकीब तो आखिर वो नाम किस का था
वफ़ा करेंगे,निबाहेंगे,बात मानेंगे
तुम्हे भी याद है कुछ ये कलाम किस का था
रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुकमि कौन हुआ है मक़ाम किस का था
गुजर गया वो जमाना कहूँ तो किस से कहूँ
ख्याल मेरे दिल को सुब्हो-शाम किस का था
हमारे खत के तो पुर्जे किये पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुने बदिल वो पयाम किस का था.
                                    (दाग देहलवी)

Wednesday, 15 August 2012

तेरी खुशी में अगर गम में भी खुशी न हुई
वो जिंदगी तो मुहब्बत की जिंदगी न हुई
सबा ये जाके उनसे हमारा पयाम कह देना
गये हो जब से यहाँ सुबहो-शाम न हुई
इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मज़बूरी
कि हमने आह तो की उनसे आह भी न हुई
ख्याले-यार,सलामत तुझे खुदा रक्खे
तेरे बगैर कभी घर में रौशनी न हुई.
                           (जिगर मुरादाबादी)

Tuesday, 14 August 2012


रंज की जब गुफ्तुगू होने लगी

आप से तुम,तुम से तू होने लगी

मेरी रुसवाई की नौबत आ गई

शोहरत उनकी कुबकू होने लगी

अब के मिल के क्या रंग हो

फिर हमारी जुस्तुजू होने लगी

दाग इतराए हुए फिरते है

शायद उनकी आबरू होने लगी.

                        (दाग देहलवी)

Monday, 13 August 2012


गिरना नहीं है और संभालना नहीं है अब

बैठे है रह्गुजार पर चलना नहीं है अब

पिछला पहर है शब का सबेरे की खैर हो

बुझते हुए चराग है जलना नहीं है अब

है आस्ती से काम न दामन से कुछ गरज

पत्थर बने हुए है पिघलना नहीं है अब

मंजर ठहर गया है कोई दिल में आन कर

दुनिया के साथ उसको बदलना नहीं है अब

लब आशनाए-हरफे तबस्सुम नहीं रहे

दिल के लहू को अश्क में ढालना नहीं है अब.

                                    (मुगन्नी तबस्सुम)

आज तुमसे बिछड रहा हूँ

आज कहता हूँ फिर मिलूँगा तुमसे

तुम मेरा इंतज़ार करती रहो

आज का एतबार करती रहो

लोग कहते है वक्त चलता है

और इंसान भी बदलता है

काश रुक जाए वक्त आज की रात

 और बदले न कोई आज के बाद

वक्त बदले ये दिल न बदलेगा

तुमसे रिश्ता कभी न टूटेगा

तुम ही खुशबू हो मेरी सांसो की

तुम ही मंजिल हो मेरे सपनो की

लोग बोते है प्यार के सपने

और सपने बिखर भी जाते है

एक एहसास ही तो है ये वफ़ा

और अहसास मर भी जाते है.

                         (सुदर्शन फाखिर)

Friday, 10 August 2012

उसकी हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ
ढूँढने उसको चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ
मेहरबां होके बुला लो मुझे चाहो जिस वक्त
मैं गया वक्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूँ
डालकर ख़ाक मेरे खून पे कातिल ने कहा
कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी के मिटा भी न सकूँ
जहर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वरना
क्या कसम है तेरे मिलने की के खा भी न सकूँ
नक्श-ए-पा देख तो लूं लाख करूँगा सजदे
सर मेरा अर्श नहीं है कि झुका भी न सकूँ
बेवफा लिखते है वो अपनी कलम से मुझको
ये वो किस्मत का लिखा है कि जो मिटा भी न सकूँ
इस तरह सोये है सर रख के मेरे जानों पर
अपनी सोई हुई किस्मत को जगा भी न सकूँ.
                                   (अमीर मीनाई)
दिले बेताब पर अब किस तरह काबू आए
जिस तरफ देखता हूँ मुझको नज़र तू आए
जुल्फ बिखरा के जो गुलशन में कभी तू आए
फूल तो फूल हैं कांटो से भी खुशबू आए
खुश्क शाखों पे भी मुश्किल है के आ जाये बहार
मेरे अहसास की वादी में अगर तू आए
वक्त ने फ़ेंक दिया लाके हवेली से कहां
एक दोशीजा के पैरों में जो घुंगरू आए
हो गयी दूर जवानों से हमारे तहजीब
अब तो शायद ही पलट कर कभी उर्दू आए
उनसे बिछड़े हुए मुद्दत हुई फिर भी ‘हसरत’
जाने क्यों आज मेरी आँखों में आंसू आए.
                                (हसरत खतौलवी)