यूँ लगता है सबकुछ खोने आया था
मैं इस घर में तुझको रोने आया था
तू मेरे हमराह तो आया था लेकिन
तन्हाई के काँटे बोने आया था
मैं उसके दीदार से कब सैराब हुआ
वो तो बस दमन को भिगोने आया था
मैं तकता था उसको प्यासे ओठों से
बादल मेरी नाव डुबोने आया था
गहरी नींद से मुझको जगाकर छोड़ गया
ख्वाब मेरी आँखों में सोने आया था.
(मुगन्नी तबस्सुम)