याद आता है जमाना कैसा
रूठना कैसा मनाना कैसा
नारसायी थी मेरी किस्मत की
मिल गया तुझको बहाना कैसा
शहर की संग जनी से बचकर
दश्त में ख़ाक उड़ाना कैसा
दोनों हाथों से लुटाया हमने
जिंदगी भी थी खजाना कैसा.
(मुगन्नी
तबस्सुम)
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