Friday, 5 October 2012


कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की

उसने खुशबू की तरह मेरी पजीराई की

कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उसने

बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की 

वो कहीं भी गया,लौटा तो मिरे पास आया

बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की 

तेरा पहलू तिरे दिल की तरह आबाद रहे

तुझ पे गुजरे न क़यामत शबे-तन्हाई की

उसने जलती हुई पेशानी पर जब हाथ रखा

रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की

अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है

जाग उठती है अजब ख्वाहिशें अंगड़ाई की.

                                  (परवीन शाकिर)

उसी तरह से हर इक जख्म खुशनुमा देखे

वो आये तो मुझे अब भी हरा-भरा देखे

गुजर गए है बहुत दिन रफाकते-शब में

इक उम्र हो गयी चेहरा वो चाँद सा देखे

मिरे सुकूत से जिसको गिले रहे क्या-क्या

बिछडते वक्त इन आखों का बोलना देखे

तिरे सिवा भी कई रंग खुशनजर थे मगर

जो तुझको देख चूका हो वो और क्या देखे

बस एक रेत का जर्रा बचा था आंखो में

अभी तलक जो मुसाफिर का रस्ता देखे

उसी से पूछे कोई दश्त की रफाकत-जो

जब आंख खोले,पहाड़ों का सिलसिला देखे

तुझे अजीज था और मैंने उसको जीत लिया

मिरी तरफ भी तो इक पल तिरा खुदा देखे.

                                   (परवीन शाकिर)

Tuesday, 2 October 2012


बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा

इस जख्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा

इक बार जिसे चाट गयी धूप की ख्वाहिश

फिर शाख पे उस फूल को खिलते नहीं देखा

यकलख्त गिरा है तो जड़ें तक निकल गयी

जिस पेड़ को आंधी में भी हिलते नहीं देखा

काँटों में घिरे फूल को चूम आएगी लेकिन

तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा

किस तरह मेरी रूह हरी कर गया आखिर

वो जहर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा .

                                   (परवीन शाकिर)

Tuesday, 11 September 2012


नाम ही रह गया इक अंजुमन आराई का

छिप गया चाँद भी अब तो शबे तन्हाई का

दिल से जाती नहीं ठहरे हुए कदमों की सदा

आँख ने स्वाँग रचा रखा है बीनाई का

एक-एक याद को आहों से जलाता जाऊँ

काम सौपा है अजब उसने मसीहाई का

अब न वह लम्स निगाहों का,न खुशबू की सदा

दिल ने देखा था मगर ख्वाब शनासाई का

   साअते दर्द फरोजॉ है बहा ले आसूँ

  टूटने को है कडा वक्त शकेबाई का

                              (मुगन्नी तबस्सुम)

सरे राह कुछ भी कहा नहीं कभी उसके घर में गया नहीं

मैं जनम जनम से उसी का हूँ उसे आज तक ये पता नहीं

उसे पाक नजरों से चूमना भी इबारतों में शुमार है

कोई फूल लाख करीब हो कभी मैंने उसको छुआ नहीं

ये खुदा की देन अजीब है कि इसी का नाम नसीब है

जिसे तूने चाहा मिल गया जिसे मैंने चाहा मिला नहीं

इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ करीबी अजीज है

उन्हें मेरी कोई खबर नहीं मुझे उनका कोई पता नहीं.

                                         (बशीर बद्र)

उनको आईना बनाया धूप का चेहरा मुझे

रास्ता फूलों का सबको आग का दरिया मुझे

चाँद चेहरा,जुल्फ दरिया,बात खुशबू,दिल चमन

इक तुम्हे देकर खुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे

जिस तरह वापस कोई ले जाए अपनी चिट्ठिया

जाने वाला कर गया इस तरह तन्हा मुझे

तुमने देखा है किसी मीरा को मंदिर में कभी

एक दिन उसने खुदा से इस तरह माँगा मुझे

मेरी मुट्ठी में सुलगती रेत रख कर चल दिया

कितनी आवाजें दिया करता था ये दरया मुझे.

                                    (बशीर बद्र)

Thursday, 6 September 2012


कहाँ आँसुओ की ये सौगात होगी

नये लोग होंगे नई बात होगी

मैं हर हाल में मुस्कुराता रहूँगा

तुम्हारी मुहब्बत अगर साथ होगी

चरागों को आँखों में महफूज रखना

बड़ी दूर तक रात ही रात होगी

परेशां हो तुम भी परेशां हूँ मैं भी

चलो मैकदे में वहीँ बात होगी

चरागों की लौ से सितारों की जौ तक

तुम्हे मैं मिलूँगा जहाँ रात होगी

जहाँ वादियो में नये फूल आये

हमारी तुम्हारी मुलाकात होगी

सदाओं को अल्फाज मिलने न पाए

न बादल घिरेंगे न बरसात होगी

मुसाफिर हैं हम भी मुसाफिर हो तुम भी

किसी मोड पर फिर मुलाकात होगी.

                             (बशीर बद्र)

Tuesday, 4 September 2012


सुबहे कैसी आग लगाने वाली थी

शामे कैसी धुआँ उड़ने वाली थी

क्या दिन थे जो दिल को दुखाने वाले थे

राते थी जो दर्द जगाने वाली थी

अब भी भटक कर दिल में कभी आ जाती है

यादें जो अश्को को बहाने वाली थी

कैसा अथाह समुन्दर था वह ख्यालों का

मौजें कितना शोर मचाने वाली थी

दरवाजे सब दिल में आकार खुलते है

दीवारें चेहरों को दिखाने वाली थी

रास्तो में जिंदा थी आहट कदमों की

गलियाँ क्या खुशबू महकाने वाली थी

बरसातें जख्मों को हरा कर देती थी

और हवाएँ फूल खिलाने वाली थी

कैसी वीरानी अब इन पर बरसती है

यह आँखे तो दिये जलाने वाली थी

उन बातों से दिल का खजाना खाली है

‘सौगात’ वह बातें जो अगले ज़माने वाली थी.

                                    (बशीर बद्र)

Monday, 3 September 2012


कल मेरे लफ्जों में मेरी जान रहेगी

दुनिया जब देखेगी हैरान रहेगी

जाने वाले मुड़कर भी देखेंगे नहीं

बस्ती जो उजड़ी है अब वीरान रहेगी

जब दिल से तस्वीर तेरी हट जायेगी

जीने और मरने में क्या पहचान रहेगी

रिश्ता जब यादों का दिल से टूटेगा

मर जाने की मुश्किल भी आसान रहेगी

हिज्र को शब से ऐसी तो उम्मीद न थी

पहचानेगी मुझको और अनजान रहेगी

क्या ये दीद का लम्हा खाली जायेगा

क्या ये दर्द की साअत बेइन्कान रहेगी.

                                (मुगन्नी तबस्सुम)

ये चिराग बे नजर है ये सितारा बे जुबाँ है

अभी तुमसे मिलता जुलता कोई दूसरा कहाँ है

वही शख्स जिस पे अपने दिलों जाँ निसार कर दूँ

वो अगर खफा नहीं है तो जरुर बदगुमाँ है

कभी पा के तुझको खोना,कभी खो के तुझको पाना

ये जनम जनम का रिश्ता तिरे मिरे दरमियाँ है

मिरे साथ चलने वाले तुझे क्या मिला सफर में

वही दुःख भरी जमीं है वही गम का आसमां है

मैं इसी गुमॉ में बरसों बड़ा मुतमइन रहा हूँ

तेरा जिस्म बेतगइयुर मेरा प्यार जाविदाँ है

उन्ही रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे

मुझे रोक रोक पूछा तिरा हमसफ़र कहाँ हैं.

                                (बशीर बद्र) 

मुसाफिर के रस्ते बदलते गए

मुकद्दर में चलना था चलते गए

मिरे रास्तों में उजाला रहा

दिए उसकी आँखों के जलते रहे

कोई फूल सा हाथ कांधे पर था

मिरे पाँव शोलों पर चलते रहे

सुना है उन्हें भी हवा लग गयी

हवाओं के जो रुख बदलते रहे

वह क्या था जिसे हम ने ठुकरा दिया

मगर उम्र भर हाथ मलते रहे

मोहब्बत,अदावत,वफ़ा,बेरुखी

किराये के घर थे बदलते रहे

लिपट कर चरागों से वो सो गए

जो फूलों पे करवट बदलते रहे.

                          (बशीर बद्र)

 

Thursday, 30 August 2012


यूँ लगता है सबकुछ खोने आया था

मैं इस घर में तुझको रोने आया था

तू मेरे हमराह तो आया था लेकिन

तन्हाई के काँटे बोने आया था

मैं उसके दीदार से कब सैराब हुआ

वो तो बस दमन को भिगोने आया था

मैं तकता था उसको प्यासे ओठों से

बादल मेरी नाव डुबोने आया था

गहरी नींद से मुझको जगाकर छोड़ गया

ख्वाब मेरी आँखों में सोने आया था.

                              (मुगन्नी तबस्सुम)

फूल यादों के खिला देती है

रात दीवाना बना देती है

नींद आँखों को सजा देती है

ख्वाब में दिल को जगा देती है

चाँद आँखों में भटकता है अभी

अब भी जंजीर सदा देती है

एक हँसतीं हुई तस्वीर को मैं

देखता हूँ तो रुला देती है

जिंदगी और तो क्या देती है

गम की मियाद बढ़ा देती है.

                      (मुगन्नी तबस्सुम)

सुब्ह होती है छुपा लो हमको

रात भर चाहने वाले हमको

हम हकीकत है नजर आते है

दास्तानों में छुपा लो हमको

दिल न पा जाये कहीं शब का राज

सुब्ह से पहले उठा लो हमको

हम ज़माने के सताए है बहुत

अपने सीने से लगा लो हमको

वक्त के होंट हमें छु लेंगे

अन कहे बोल है हम गा लो हमको

कल खरीदारों के पहरे होंगे

आज की रात चुरा लो हमको.

                        (बशीर बद्र)

 

Tuesday, 28 August 2012


याद आता है जमाना कैसा

रूठना कैसा मनाना कैसा

नारसायी थी मेरी किस्मत की

मिल गया तुझको बहाना कैसा

शहर की संग जनी से बचकर

दश्त में ख़ाक उड़ाना कैसा

दोनों हाथों से लुटाया हमने

जिंदगी भी थी खजाना कैसा.

                       (मुगन्नी तबस्सुम)