Tuesday, 2 October 2012


बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा

इस जख्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा

इक बार जिसे चाट गयी धूप की ख्वाहिश

फिर शाख पे उस फूल को खिलते नहीं देखा

यकलख्त गिरा है तो जड़ें तक निकल गयी

जिस पेड़ को आंधी में भी हिलते नहीं देखा

काँटों में घिरे फूल को चूम आएगी लेकिन

तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा

किस तरह मेरी रूह हरी कर गया आखिर

वो जहर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा .

                                   (परवीन शाकिर)

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