नाम ही रह गया इक अंजुमन आराई का
छिप गया चाँद भी अब तो शबे तन्हाई का
दिल से जाती नहीं ठहरे हुए कदमों की सदा
आँख ने स्वाँग रचा रखा है बीनाई का
एक-एक याद को आहों से जलाता जाऊँ
काम सौपा है अजब उसने मसीहाई का
अब न वह लम्स निगाहों का,न खुशबू की सदा
दिल ने देखा था मगर ख्वाब शनासाई का
साअते दर्द फरोजॉ है बहा ले आसूँ
टूटने को है कडा वक्त शकेबाई का
(मुगन्नी
तबस्सुम)
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