Tuesday, 11 September 2012


नाम ही रह गया इक अंजुमन आराई का

छिप गया चाँद भी अब तो शबे तन्हाई का

दिल से जाती नहीं ठहरे हुए कदमों की सदा

आँख ने स्वाँग रचा रखा है बीनाई का

एक-एक याद को आहों से जलाता जाऊँ

काम सौपा है अजब उसने मसीहाई का

अब न वह लम्स निगाहों का,न खुशबू की सदा

दिल ने देखा था मगर ख्वाब शनासाई का

   साअते दर्द फरोजॉ है बहा ले आसूँ

  टूटने को है कडा वक्त शकेबाई का

                              (मुगन्नी तबस्सुम)

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