Tuesday, 11 September 2012


सरे राह कुछ भी कहा नहीं कभी उसके घर में गया नहीं

मैं जनम जनम से उसी का हूँ उसे आज तक ये पता नहीं

उसे पाक नजरों से चूमना भी इबारतों में शुमार है

कोई फूल लाख करीब हो कभी मैंने उसको छुआ नहीं

ये खुदा की देन अजीब है कि इसी का नाम नसीब है

जिसे तूने चाहा मिल गया जिसे मैंने चाहा मिला नहीं

इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ करीबी अजीज है

उन्हें मेरी कोई खबर नहीं मुझे उनका कोई पता नहीं.

                                         (बशीर बद्र)

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