Tuesday, 4 September 2012


सुबहे कैसी आग लगाने वाली थी

शामे कैसी धुआँ उड़ने वाली थी

क्या दिन थे जो दिल को दुखाने वाले थे

राते थी जो दर्द जगाने वाली थी

अब भी भटक कर दिल में कभी आ जाती है

यादें जो अश्को को बहाने वाली थी

कैसा अथाह समुन्दर था वह ख्यालों का

मौजें कितना शोर मचाने वाली थी

दरवाजे सब दिल में आकार खुलते है

दीवारें चेहरों को दिखाने वाली थी

रास्तो में जिंदा थी आहट कदमों की

गलियाँ क्या खुशबू महकाने वाली थी

बरसातें जख्मों को हरा कर देती थी

और हवाएँ फूल खिलाने वाली थी

कैसी वीरानी अब इन पर बरसती है

यह आँखे तो दिये जलाने वाली थी

उन बातों से दिल का खजाना खाली है

‘सौगात’ वह बातें जो अगले ज़माने वाली थी.

                                    (बशीर बद्र)

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