कल मेरे लफ्जों में मेरी जान रहेगी
दुनिया जब देखेगी हैरान रहेगी
जाने वाले मुड़कर भी देखेंगे नहीं
बस्ती जो उजड़ी है अब वीरान रहेगी
जब दिल से तस्वीर तेरी हट जायेगी
जीने और मरने में क्या पहचान रहेगी
रिश्ता जब यादों का दिल से टूटेगा
मर जाने की मुश्किल भी आसान रहेगी
हिज्र को शब से ऐसी तो उम्मीद न थी
पहचानेगी मुझको और अनजान रहेगी
क्या ये दीद का लम्हा खाली जायेगा
क्या ये दर्द की साअत बेइन्कान रहेगी.
(मुगन्नी तबस्सुम)
No comments:
Post a Comment