Monday, 3 September 2012


कल मेरे लफ्जों में मेरी जान रहेगी

दुनिया जब देखेगी हैरान रहेगी

जाने वाले मुड़कर भी देखेंगे नहीं

बस्ती जो उजड़ी है अब वीरान रहेगी

जब दिल से तस्वीर तेरी हट जायेगी

जीने और मरने में क्या पहचान रहेगी

रिश्ता जब यादों का दिल से टूटेगा

मर जाने की मुश्किल भी आसान रहेगी

हिज्र को शब से ऐसी तो उम्मीद न थी

पहचानेगी मुझको और अनजान रहेगी

क्या ये दीद का लम्हा खाली जायेगा

क्या ये दर्द की साअत बेइन्कान रहेगी.

                                (मुगन्नी तबस्सुम)

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