क्यूँ आँख में एक आँसू न रहा मालूम नहीं
क्या अश्कों ने तारों से कहा मालूम नहीं
मैं अपने ख्वाबों की दुनिया में खोया रहा
कब रात ढली कब चाँद बुझा मालूम नहीं
जब भोर भये कोयल की सदा कानों में पड़ी
क्यों मेरे दिल में दर्द उठा मालूम नहीं
यह जान गए हँसने की सजा मिलती हैं अब
इस रोने का अंजाम हैं क्या मालूम नहीं
मैं अश्कों के सैलाब में अपने डूबा रहा
कब साहिल का मंजर बदला मालूम नहीं.
(मुगन्नी तबस्सुम)
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