गिरना नहीं है और संभालना नहीं है अब
बैठे है रह्गुजार पर चलना नहीं है अब
पिछला पहर है शब का सबेरे की खैर हो
बुझते हुए चराग है जलना नहीं है अब
है आस्ती से काम न दामन से कुछ गरज
पत्थर बने हुए है पिघलना नहीं है अब
मंजर ठहर गया है कोई दिल में आन कर
दुनिया के साथ उसको बदलना नहीं है अब
लब आशनाए-हरफे तबस्सुम नहीं रहे
दिल के लहू को अश्क में ढालना नहीं है अब.
(मुगन्नी
तबस्सुम)
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